अक्षय तृतीया 2017 – इस तरह करें पूजा, होगी घर में पैसों की बारिश

अक्षय तृतीया 2017 – इस तरह करें पूजा, होगी घर में पैसों की बारिश

अक्षय तृतीया 2017

हिन्दू धर्म में अक्षय तृतीय का बहुत महत्व है। इस दिन सभी शुभ कार्य किए जाते हैं। दिल्ली के सर्वश्रेष्ठ ज्योतिषी “हिमानी जी” ने बताया कि शास्त्रानुसार इस दिन से सतयुग एवं त्रेतायुग का आरंभ माना जाता है, क्योंकि इस दिन किया हुआ जप, तप, ज्ञान तथा दान अक्षय फलदायक होता है। इसलिए इसे अक्षय तृतीया कहते हैं। ज्योतिष में इसे अबूझ मुर्हुत माना जाता है, इसमें विवाह, गृह प्रवेश, गृहारंभ, नवीन, कार्य आरंभ, धन का निवेश आदि सभी प्रकार के शुभ कार्य किए जाते हैं।

शुभ मूर्हूत में करें पूजा

ज्योतिषचार्या ने बताया कि इस वर्ष 29 अप्रैल 2017, शनिवार को बैशाख शुक्ल तृतीया सूर्योदय से लेकर प्रातः 6.56 तक व्याप्त रहने तथा रोहिणी नक्षत्र समायुक्त होने के कारण अक्षय तृतीया के लिए उपयुक्त रहेगी। लौकिक मान्यतानुसार उदया तिथि सर्वाधिक महत्व रखती है। इस दिन रोहिणी नक्षत्र का होना व्यापार आदि कार्य के लिये अत्यंत शुभ माना जाता है। इस बार विशेष बात यह है कि शनिवार में रोहिणी नक्षत्र मिलने से बनने वाला श्रीवत्स (लक्ष्मी प्रदायक) योग प्रातः 10:55 बजे तक रहेगा। इस दिन अपनी परंपरा अनुसार पूजा कार्य करना प्रातः 6:19 से लेकर 8:15 बजे तक श्रेष्ठ रहेगा। इसके बाद स्थिर ‘सिंह लग्न मध्यान्ह 12:07 से लेकर अपराहन 2:20 बजे तक रहेगी। चौघड़िया मुहुर्त के विचार से शुभ चौघड़िया की बेला प्रातः 7:04 बजे से 8:42 बजे तक रहेगी

व्यापारिक कार्यों को शुभ मूर्हुत पंडित

ज्योतिष ने बताया कि इस वर्ष गोधूलि वेला में पूजन के समय तृतीया तिथि का अभाव है। इसलिए जो व्यापारी अक्षय तृतीय के गोधूलि वेला अर्थात परशुराम जयंती पर पूजन करना चाहते हैं, उन्हें एक दिन पूर्व 28 अप्रैल शुक्रवार को सायंकालीन तृतीय में गोधूलि वेला सायं 6:28 बजे से रात्रि 8:40 बजे तक पूजन धन निवेश करना श्रेष्ठ रहेगा। रोहिणी ऩक्षत्र का संयोग होने से व्यापारिक कार्यों के लिए यह अतिशुभ है।

ग्रहों की स्थिति उन्होंने

बताया कि इस दिन शनिवार दिनांक 29 अप्रैल 2017 स्थिर लग्न ‘वृष प्रातः 06.19 से 08.15 तक रहेगी, इसमें चतुर्थेश सूर्य, द्वितीयेश और पंचमेश बुध के साथ द्धादश भाव में है। यह वुधादित्य नामक एक शुभ राजयोग है। व्यापारेश व द्धदशेश मंगल लग्न भाव में चन्द्र के साथ चान्दी नामक योग बनाए हुए हैं। यह व्यापार में शुभ होता है। वृष लग्न के लिए शनि नवमेश व दशमेश होकर केन्द्र त्रिकोण का स्वामी होकर अष्टमभाव में धनु राशि में बैठा है, यह भी एक शुभ सूचक योग है। तृतीयेश चन्द्रमा लग्न में अपनी उच्च राशि वृष पर मंगल के साथ बैठकर एक शुभ राजयोग बना रहा है। चतुर्थ भाव में सिंह का राहू व पंचम भाव में कन्या का गुरू शुभ योग बना रहा है। अतः वृष लग्न में पूजन करने के लिये सूर्य बुध केतु का दान-उपाय कर लेना अति उत्तम रहेगा। पूर्ण शुभ फल की प्राप्ति होगी।

इस दिन का है बड़ा महत्व

ज्योतिषचार्या का कहना है कि इस दिन गंगा स्नान का बड़ा भारी माहात्म्य है। साथ ही पुरखों की आत्माओं की प्रसन्नता के लिए घड़ा, कलश, पंखा, छाता, चावल, दाल, नमक, घी, चीनी, साग, इमली, फल वस्त्र खड़ाऊ सत्तू, ककड़ी, खरबूजा आदि का दान श्रेष्ठ रहता है। इस दिन तिल सहित, कुशों के जल से पितरों को जलदान करने से पित्तीश्वरों की अनन्तकाल तक तृप्ति होती है। इस दिन चारों धामों में प्रमुख श्री बद्री नारायण के पट खुलते हैं उनको मिश्री तथा भीगी हुई चने की दाल का भोग लगाते हैं। इसी दिन भगवान परशुराम का जन्म हुआ था, नर-नारायण ने भी इसी दिन अवतार लिया था। वृंदावन के श्री बांके बिहारी के मंदिर में केवल इसी दिन चरण दर्शन होते हैं। इसलिए इस दिन उपरोक्त समय के धन का निवेश आदि करना शुभ फलों की प्राप्ति करवाता है।

Source – Rajasthan Patrika

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