वेद क्या हैं

वेद क्या हैं ?

— हिमानी “ अज्ञानी ” की कलम से

maharishi ved vyas

maharishi ved vyas

किसी भी धार्मिक लेखन को दो भागों (1) श्रुति तथा (2) स्मृति में विभक्त किया जाता है। श्रुति अर्थात् जो सुना गया है और स्मृति जिसे हमें याद करवाया गया है। हिंदू श्रुतियों के लिए कहा जाता है कि इन्हें ऋषियों ने गहन ध्यान की अवस्था में सुना था, ये परम परमेश्वर की वाणी है। प्राचीन काल में बहुत से ऋषियों ने ध्यान में विभिन्न प्रकार के उपदेश सुने थे, इन्हें ही श्रुति कहा जाता है। श्रुति को भी दो भागों में विभक्त किया गया है- आगम तथा निगमचार वेद (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद व अथर्ववेद) को ही निगम कहा गया है। आगमों की संख्या छह से अधिक है, इनमें से छह प्रमुख आगम शैव, शाक्त, वैष्णव, गणपत्य, सौर, तथा कुमार हैं। वेद तथा आगम दोनों में बहुत से श्लोक हैं। इनमें से वेदों (निगम) को विज्ञान तथा आगमों को व्यावहारिक विज्ञान (Applied Science) कहा जाता है। सरल शब्दों में वेदों को विज्ञान का सैद्धांतिक भाग तथा आगमों को विज्ञान का प्रायोगिक भाग माना गया है। उदाहरण के लिए जिस प्रकार भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान तथा गणित शुद्ध विज्ञान हैं तथा इन सभी विज्ञानों के संयोग से बनी इंजीनियरिंग की शाखाएं इन विज्ञानों को जीवन में प्रयोग करने की विधाएं हैं।

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माना जाता है कि वेदों का क्षेत्र बहुत विशाल है तथा ये कुल 21 शाखाओं में बंटे हुए हैं जिन्हें कुल 6 दर्शनों में विभक्त किया गया है, इनमें से भी प्रत्येक ने इन चारों वेदों का अपने-अपने दर्शन अनुसार वर्णन किया है। (However the Vedas are very vast and initially thought in 21 schools broadly categorized into 6 Darshans, each school thought all 4 Vedas but different volumes.) ये सभी दर्शन अलग-अलग लोगों के द्वारा आरंभ किए गए हैं जो किसी न किसी ऐसे ऋषि के शिष्य थे, जिन्हें इन वेदों का ज्ञान था। परन्तु आज के संदर्भ में देखा जाए तो केवल एक ही दर्शन के चार वेद बचे हुए हैं, शेष सभी समय के कालखंड में खो गए हैं। (But today the Collective Vedas of all schools that we have are comparable to that of of 1 school and remaining are lost over a period of time.) ऐसे में आज जो वेद उपलब्ध हैं, वे अपर्याप्त तथा अधूरे ही है।

108 पुराण

rishi ved vyasस्मृतियों में कुल 108 पुराण हैं, जिनमें से 18 महापुराण तथा 18 उपपुराण हैं, शेष सामान्य पुराण हैं। पुराणों को हम प्राचीन इतिहास भी मान सकते हैं। ऋषियों ने स्वयं के द्वारा देखे गए ऐतिहासिक घटनाओं को पुराणों के रूप में संजो कर लिखा है। हिंदुओं के महान महाकाव्य रामायण तथा महाभारत भी इतिहास ही है जिनका ऋषियों ने पुनर्लेखन किया है।

वेद तथा आगमों

वेद तथा आगमों के अनुसार कुल चार प्रकार के मार्ग हैं जिन्हें शैव, शाक्त, वैष्णव तथा स्मार्त (Smartha) कहा जाता है। शैव मत के अनुयायी शिव को, वैष्णव अनुयायी विष्णु को, शाक्त अनुयायी देवी अथवा शक्ति को सर्वोच्च परब्रह्म परमेश्वर मानते हैं जबकि स्मार्त 5 देवताओं शिव, विष्णु, देवी, सूर्य तथा गणेश को एक ही परब्रह्म के पांच स्वरूप मानते हैं तथा उनमें से किसी भी एक अथवा अधिक की आराधना करते हैं। दक्षिण भारत में स्मार्त मत के अनुयायी कार्तिकेय को छठें ईश्वर के रूप में स्वीकार करते हैं।

देवता की आराधना

सभी हिंदू इनमें से किसी न किसी एक देवता की आराधना करते हैं तथा जो लोग इनसे प्रसन्न नहीं हैं, उन्होंने जैन धर्म, बौद्ध धर्म तथा सिख धर्म को अपना लिया है। वास्तव में देखा जाए तो ईसाई धर्म अथवा इस्लाम की तरह यहां कोई धर्म परिवर्तन नहीं होता है वरन सनातन धर्म एक परिवार की भांति हैं, जहां आपको जो भी मार्ग उचित लगता है, जो भी देवता आपको भाता है, आप उसी के अनुयायी बन कर उसकी पूजा करने के लिए स्वतंत्र हैं।

वेदों की रचना

आगमों तथा निगमों को संयुक्त रूप से श्रुति कहा जाता है। वेदों में बताए गए ज्ञान को आज उसी स्वरूप में उसी विवरण के अनुसार मानना अनिवार्य नहीं है जिस प्रकार के वेदों की रचना के समय था। उस समय और आज के समय में बहुत अंतर आ चुका है। इसलिए वेदों के सार को उपनिषदों में संगृहीत किया गया है। कालान्तर में उपनिषदों का ज्ञान भी समय के साथ अप्रासंगिक हो गया। उदाहरण के लिए आज के समय में हर घर में पानी की सप्लाई के लिए वाटर लाइन कनेक्शन दिए गए हैं तो क्यों कोई भी वरूण देव का आव्हान कर वर्षा करवाने की कामना करेगा। इसीलिए उपनिषदों के सार को कृष्ण ने श्रीमद्भगवतगीता में बताया है। श्रीमद्भगवतगीता को उपनिषदों का ह्रदय कहा गया है। यही कारण है कि श्रीमद्भगवतगीता को श्रुतियों के समकक्ष रखा गया है यद्यपि श्रीमद्भगवतगीता स्वयं भी हिंदुओं के महाकाव्य महाभारत का ही एक भाग हैं।

वर्तमान में जबकि वेदों का बहुत सा भाग लुप्त हो गया है तब भी हमारे पास बहुत कुछ ऐसा बचा है जो मानव जाति को प्रसन्न एवं समृद्ध बनाए रखने के लिए पर्याप्त है। आज हम इस बात का अंदाजा भी नहीं लगा सकते कि यदि वेदों का पूरा ज्ञान मिल जाए तो मानव जाति का कितना भला हो सकता है। वेद, आगम, पुराण, इतिहास आदि में हमारे लिए पर्याप्त सामग्री है। इनमें मानव जाति के विकास, उत्थान के साथ साथ अन्य आवश्यक बातें यथा रॉकेट साइंस, वायुयान, एटोमिक साइंस, न्यूक्लियर फिजिक्स, मैटलर्जी, इलेक्ट्रिक करेंट, बैटरीज, टेस्ट ट्यूब बेबीज, मेडीसिन्स, सर्जरी (जैसे प्लास्टिक सर्जरी भी) तथा अन्य सभी प्रकार के विज्ञान शामिल हैं जिनका पूरा ज्ञान प्राप्त करना अभी बाकी है।

वेद के विभाग चार है

ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद। ऋग-स्थिति, यजु-रूपांतरण, साम-गति‍शील और अथर्व-जड़। ऋक को धर्म, यजुः को मोक्ष, साम को काम, अथर्व को अर्थ भी कहा जाता है। इन्ही के आधार पर धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र, कामशास्त्र और मोक्षशास्त्र की रचना हुई।

ऋग्वेद

ऋक अर्थात् स्थिति और ज्ञान। ऋग्वेद सबसे पहला वेद है जो पद्यात्मक है। इसके 10 मंडल (अध्याय) में 1028 सूक्त है जिसमें 11 हजार मंत्र हैं। इस वेद की 5 शाखाएं हैं – शाकल्प, वास्कल, अश्वलायन, शांखायन, मंडूकायन। इसमें भौगोलिक स्थिति और देवताओं के आवाहन के मंत्रों के साथ बहुत कुछ है। ऋग्वेद की ऋचाओं में देवताओं की प्रार्थना, स्तुतियां और देवलोक में उनकी स्थिति का वर्णन है। इसमें जल चिकित्सा, वायु चिकित्सा, सौर चिकित्सा, मानस चिकित्सा और हवन द्वारा चिकित्सा आदि की भी जानकारी मिलती है। ऋग्वेद के दसवें मंडल में औषधि सूक्त यानी दवाओं का जिक्र मिलता है। इसमें औषधियों की संख्या 125 के लगभग बताई गई है, जो कि 107 स्थानों पर पाई जाती है। औषधि में सोम का विशेष वर्णन है।

यजुर्वेद

यजुर्वेद का अर्थ : यत् + जु = यजु। यत् का अर्थ होता है गतिशील तथा जु का अर्थ होता है आकाश। इसके अलावा कर्म। श्रेष्ठतम कर्म की प्रेरणा। यजुर्वेद में यज्ञ की विधियां और यज्ञों में प्रयोग किए जाने वाले मंत्र हैं। यज्ञ के अलावा तत्वज्ञान का वर्णन है। तत्व ज्ञान अर्थात रहस्यमयी ज्ञान। ब्रह्माण, आत्मा, ईश्वर और पदार्थ का ज्ञान। यह वेद गद्य मय है। इसमें यज्ञ की असल प्रक्रिया के लिए गद्य मंत्र हैं। इस वेद की दो शाखाएं हैं शुक्ल और कृष्ण।

कृष्ण : वैशम्पायन ऋषि का सम्बन्ध कृष्ण से है। कृष्ण की चार शाखाएं हैं।

शुक्ल : याज्ञवल्क्य ऋषि का सम्बन्ध शुक्ल से है। शुक्ल की दो शाखाएं हैं। इसमें 40 अध्याय हैं। यजुर्वेद के एक मंत्र में च्ब्रीहिधान्यों का वर्णन प्राप्त होता है। इसके अलावा, दिव्य वैद्य और कृषि विज्ञान का भी विषय इसमें मौजूद है।

सामवेद

साम का अर्थ रूपांतरण और संगीत। सौम्यता और उपासना। इस वेद में ऋग्वेद की ऋचाओं का संगीतमय रूप है। सामवेद गीतात्मक यानी गीत के रूप में है। इस वेद को संगीत शास्त्र का मूल माना जाता है। 1824 मंत्रों के इस वेद में 75 मंत्रों को छोड़कर शेष सब मंत्र ऋग्वेद से ही लिए गए हैं।इसमें सविता, अग्नि और इंद्र देवताओं के बारे में जिक्र मिलता है। इसमें मुख्य रूप से 3 शाखाएं हैं, 75 ऋचाएं हैं।

अथर्ववेद

थर्व का अर्थ है कंपन और अथर्व का अर्थ अकंपन। ज्ञान से श्रेष्ठ कर्म करते हुए जो परमात्मा की उपासना में लीन रहता है वही अकंप बुद्धि को प्राप्त होकर मोक्ष धारण करता है। इस वेद में रहस्यमयी विद्याओं, जड़ी बूटियों, चमत्कार और आयुर्वेद आदि का जिक्र है। इसके 20 अध्यायों में 5687 मंत्र है। इसके आठ खण्ड हैं जिनमें भेषज वेद और धातु वेद ये दो नाम मिलते हैं।

अगर हम चर्चा करते है एक सम्पूर्ण मनुष्य जीवन की तो वेद हमारे जीवन के प्रत्येक क्षेत्र को सम्पूर्ण आयाम देते है |

मुख्य विषय:

  1. मनुष्य का जन्म और सोलह संस्कार
  2. शिक्षा: गुरुकुल, शिक्षक, शिक्षा पद्यति
  3. कर्म: व्यवसाय अथवा नौकरी तथा कर्म के आधार पर वर्गीकरण
  4.  स्वास्थ्य: चिकित्सा पद्यति एवं चिकित्सक, औषधियां, आयुर्वेद, यंहा पर हम कुछ उन विषयों पर भी बात करेंगे जिन्हें वैकल्पिक चिकित्सा पद्यति माना जाता है|
  5. धर्म
  6. आध्यात्म
  7. राजनीती
  8. अर्थ व्यवस्था
  9. समाज: सामाजिक व्यवस्था एवं परिवार
  10. कला: संगीत, नाट्य शास्त्र, मूर्ति कला, चित्रकला
  11. भाषा
  12. भक्ति: उपासना, उपासना पद्यति
वार्षिक राशिफल 2020
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